Artwork text
पूरा चित्र पीला है।
ऊपर गोल छल्ले-सा सूर्य टँगा है, उसके नीचे पहाड़ की धारें कुछ काली रेखाओं में तह-दर-तह लेटी हैं। हल्लासान है।
चोटियों की ऊँचाई, घाटियों की गहराई — उसने कुछ भी ब्योरे से नहीं खींचा। पहाड़ को पूरा न खींचो, तो भी पहाड़ पूरा खड़ा रहता है।
ढलान के नीचे एक फूस का घर नीचा झुका है, पत्थर की दीवार उसे घेरती है। सामने एक घोड़ा और झुकी पीठ का एक मनुष्य।
घोड़ा सिर झुकाता है, मनुष्य कमर झुकाता है, फूस का घर और नीचा होकर हवा झेलता है। नीची चीज़ें एक-दूसरे का साथ देती हैं, अपने-अपने ढंग से झुकी हुई।
केवल पहाड़ नहीं झुकता। हज़ार बरस पहले भी वहीं था, आज भी वहीं है। झुकी हुई चीज़ें उस बड़े मौन के सहारे जीती हैं।
उसने जेजू की व्याख्या नहीं की। हवा जहाँ से गुज़री, वहाँ बस एक रेखा खींच दी।
मनुष्य को ब्योरे से न खींचो, तो भी उसके सहे हुए दिन दिखते हैं।
यहाँ दृश्य मनुष्य के पीछे की पृष्ठभूमि नहीं। मनुष्य के जिए हुए जीवन की मुद्रा है।
Key context
ब्युन शी-जी आधुनिक और समकालीन कोरियाई चित्रकार थे, जिन्होंने जेजू के Fūdo को पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त के रूप में चित्रित किया। एकांत, प्रतीक्षा, हवा और सूखी घास का रंग उनकी कला में स्थानीयता और विश्वता को जोड़ने वाला ग्लोकल कोरियाई आधुनिकतावाद रचते हैं।
