कृतियाँ/FŪDO 037
चांगदोकगुंग महल
Changdeokgung Palace
मूल जानकारी
| संख्या | FŪDO 037 |
|---|---|
| शीर्षक | चांगदोकगुंग महल창덕궁Changdeokgung Palace |
| वर्ष | 1970 |
कृति का पाठ
पाठ: Byun Joung Hoon
बर्फ़ ढके आँगन में पेड़ सीधे खड़े हैं।
डालों का बँटना और खपरैल के मोड़, बर्फ़ पर फैलती नीली छाया तक — सब बारीकी से खींचा गया।
चित्रकार जो दिखता है उसे खींचना पहले से जानता था। विषय का अनुपात पकड़ना, दृश्य में गहराई बनाना, शीत-प्रकाश के सूक्ष्म अंतर को चित्र में उतारना — यह सब उसे आता था। अकादमिक कला-शिक्षा की सिखाई सटीक आँख और सधे हाथ चित्र को सँभाले हैं।
पर उसका रास्ता यहीं नहीं रुका।
वह धीरे-धीरे पेड़ की डाल से अधिक उस डाल को हिलाती हवा खींचने लगा; घर के रूप से अधिक उस घर की समेटी छाया और सहने की मुद्रा खींचने लगा। मनुष्य के चेहरे से अधिक समय के आगे झुकी पीठ खींचने लगा; आँखों के आगे के रंग से अधिक धूप और हवा को देर तक सहा हुआ सूखी घास का रंग छोड़ने लगा।
इस शीत-दृश्य में अभी सब कुछ स्पष्ट है। पेड़ पेड़ है, घर घर है, बर्फ़ बर्फ़ है।
पर आगे चलकर वे सीमाएँ हवा में धुँधली हो जाती हैं। पेड़ हवा की देह बन जाता है, घर सहने की मुद्रा बन जाता है, मनुष्य स्थानीय परिवेश में स्थित एक छोटा अस्तित्व बन जाता है।
उसने खींचना छोड़ा नहीं।
बहुत अच्छी तरह जानता था, इसीलिए अंत में घटा सका।
यथारूप चित्रण से अस्तित्व की ओर। रूप से मुद्रा की ओर।
इस बर्फ़ ढके आँगन में, वह दूर का रास्ता शुरू हो रहा था।
भाग दो · कथाएँ — जो जीते चले जाते हैं
भाग दो
कथाएँ
जीते चले जाते लोग
उस स्थानीय परिवेश में,
लोग जीते चले जाते हैं।




