Artwork text
सानबांग पर्वत का गोल होना, बूढ़े की पीठ का झुकना — दोनों देर तक सहने से हुए हैं।
घोड़े की झुकी गर्दन, नीची एँठी फूस की छत, एक-दूसरे पर टिकी पत्थर की दीवार — सब वैसे ही।
अपनी जगह पर अपने ढंग से सहा हुआ समय जमा होकर, हर एक का आकार बन जाता है।
जितना सहा, उतना आकार बना।
आकार बाहर दिखने वाली बनावट नहीं। एक अस्तित्व अपने ऊपर बही दुनिया को झेलते हुए देर तक जिस ढंग से जिया, वह है।
आकार सहे हुए समय का निशान है।
इसलिए झुकी, घिसी, गोल हुई चीज़ों के सामने कुछ पल चुप रहना चाहिए। वह आकार बनने में, एक पूरा जीवन लगा।
Key context
ब्युन शी-जी आधुनिक और समकालीन कोरियाई चित्रकार थे, जिन्होंने जेजू के Fūdo को पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त के रूप में चित्रित किया। एकांत, प्रतीक्षा, हवा और सूखी घास का रंग उनकी कला में स्थानीयता और विश्वता को जोड़ने वाला ग्लोकल कोरियाई आधुनिकतावाद रचते हैं।
