Artwork text
सूर्य टँगा है, चित्र उजला है। पर हवा तेज़ है।
पेड़ एक ओर झुकता है, फूस का घर देह नीची करता है। बूढ़ा कमर झुकाए लाठी टेकता चलता है।
दिन उजला हो, तो भी जीवन की कठिनाई मिट नहीं जाती। दोपहर की चमकती रोशनी में भी मनुष्य झुकता है। जो दिन औरों को अच्छा दिखता है, वही उसके लिए सबसे कठिन दिन हो सकता है।
हवा मनुष्य को धकेलता समय है, न टाला जा सकने वाला इतिहास है, जीवित के पास आता जीवन का भार है।
बूढ़ा हवा से लड़ता नहीं। देह नीची कर एक-एक क़दम आगे जाता है। गिरने से बचने को झुकता है, रुकने से बचने को लाठी टेकता है।
सहना हवा-रहित दिन की प्रतीक्षा नहीं। हवा के भीतर भी अपना रास्ता न खोना है।
वह आज भी जाता है। झुकी पीठ पर दोपहर का सूर्य उजला है।
Key context
ब्युन शी-जी आधुनिक और समकालीन कोरियाई चित्रकार थे, जिन्होंने जेजू के Fūdo को पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त के रूप में चित्रित किया। एकांत, प्रतीक्षा, हवा और सूखी घास का रंग उनकी कला में स्थानीयता और विश्वता को जोड़ने वाला ग्लोकल कोरियाई आधुनिकतावाद रचते हैं।
