Artwork text
पत्थर की दीवार पर
कौवे जुटे हैं।
सामने का पत्थरों का ढेर भी
ध्यान से देखो तो
लोगों के सिकुड़कर बैठे होने जैसा है।
कंधे मिलाए,
सिर झुकाए,
एक पिंड होकर बैठे।
दूर समुद्र में
एक नाव तैरती है।
पक्षी उड़ सकते हैं,
पर पत्थर बन चुके लोग
अपनी जगह नहीं छोड़ सकते।
क्या बहुत देर तक प्रतीक्षा करते-करते
मनुष्य पत्थर हो गए?
क्या गए हुए एक को प्रतीक्षा करते हुए
बचे हुए लोग एक-दूसरे पर टिककर
एक कब्र की तरह जम गए?
नाव दूर है,
प्रतीक्षा धरती पर बची है।
पत्थरों का ढेर मृत पत्थर नहीं।
लौटकर न आने वाले की प्रतीक्षा में
वाणी खो चुके मनुष्यों का रूप है।
पत्थर आज भी
वहीं है।
Key context
ब्युन शी-जी आधुनिक और समकालीन कोरियाई चित्रकार थे, जिन्होंने जेजू के Fūdo को पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त के रूप में चित्रित किया। एकांत, प्रतीक्षा, हवा और सूखी घास का रंग उनकी कला में स्थानीयता और विश्वता को जोड़ने वाला ग्लोकल कोरियाई आधुनिकतावाद रचते हैं।
