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डगमगाता क्षितिज · 1983
Byun Shi-Ji, A Wavering Horizon, 1983 · डगमगाता क्षितिज

कृतियाँ/FŪDO 006

FŪDO 006 · 1983 · जेजू, मध्य काल

डगमगाता क्षितिज

A Wavering Horizon

मूल जानकारी

संख्याFŪDO 006
शीर्षकडगमगाता क्षितिज흔들리는 수평선A Wavering Horizon
वर्ष1983

कृति का पाठ

पाठ: Byun Joung Hoon

क्षितिज डोलता है।
संसार की कसौटी डोलती है।
धरती, घर, नाव —
सब ऐसे लहराते हैं मानो अपनी जगह खो बैठे हों।
उनके बीच
लाठी टेके एक मनुष्य खड़ा है।
ऐसा नहीं कि वह नहीं डोलता।
लाठी यही कहती है।
डोलता है, इसीलिए टेकता है।
पर डोलते हुए भी
कहाँ देखना है —
वह नहीं भूलता।

वह जाती नाव का पीछा निगाहों से नहीं करता।
गए हुए के पीछे लगी आँख
बीते हुए की ओर ढह जाती है।
वह देखता है
नाव की मंज़िल से आगे,
जहाँ अभी कुछ नहीं पहुँचा —
वह ख़ाली क्षितिज।
क्षितिज अंत नहीं।
दिखते संसार और
अभी न आए संसार के
मिलने की जगह है।
होना
जमी हुई कसौटी पर खड़े रहना नहीं।
कसौटी डोल जाए तब भी
बीते की ओर नहीं,
आने वाले की ओर
दृष्टि साधना है।
वह आज भी
जो नहीं आया, उसे देखता है।
वही देखना
उसे खड़ा रखता है।

34 भाषाओं में कृति-पाठ