Artwork text
क्षितिज डोलता है।
संसार की कसौटी डोलती है।
धरती, घर, नाव —
सब अपनी जगह खोकर लहराते हैं।
उनके बीच
लाठी टेके एक मनुष्य खड़ा है।
ऐसा नहीं कि वह नहीं डोलता।
लाठी यही कहती है।
डोलता है, इसीलिए टेकता है।
पर डोल में भी
कहाँ देखना है —
वह नहीं भूलता।
वह जाती नाव के पीछे नहीं जाता।
गए हुए के पीछे लगी आँख
बीते हुए की ओर ढह जाती है।
वह देखता है
नाव की मंज़िल से आगे,
जहाँ अभी कुछ नहीं पहुँचा —
वह ख़ाली क्षितिज।
क्षितिज अंत नहीं।
दिखते संसार और
अभी न आए संसार के
मिलने की जगह है।
होना
जमी हुई कसौटी पर खड़े रहना नहीं।
कसौटी डोल जाए तब भी
बीते की ओर नहीं,
आने वाले की ओर
दृष्टि साधना है।
वह आज भी
जो नहीं आया, उसे देखता है।
वही देखना
उसे खड़ा रखता है।
Key context
ब्युन शी-जी आधुनिक और समकालीन कोरियाई चित्रकार थे, जिन्होंने जेजू के Fūdo को पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त के रूप में चित्रित किया। एकांत, प्रतीक्षा, हवा और सूखी घास का रंग उनकी कला में स्थानीयता और विश्वता को जोड़ने वाला ग्लोकल कोरियाई आधुनिकतावाद रचते हैं।
