कृतियाँ/FŪDO 034
फिर से जुड़ी राह
The Path Rejoined
मूल जानकारी
| संख्या | FŪDO 034 |
|---|---|
| शीर्षक | फिर से जुड़ी राह다시 이어진 길The Path Rejoined |
| वर्ष | 1998 |
कृति का पाठ
पाठ: Byun Joung Hoon
ब्यून शिजी की रेखा को चुपचाप निहारो, तो पता चलता है कि वह रेखा एक-सी नहीं है।
गहरी होकर हल्की होती है। मोटी होकर पतली होती है। कहीं टूटने-सी पतली, कहीं फिर जीकर मोटी।
एक ही रेखा के भीतर उतार-चढ़ाव है।
यह जीवन की रेखा है। जीवन भी एक-सा नहीं। बलवान समय होता है, थका समय होता है। स्पष्ट समय होता है, धुँधला समय होता है। टूटने-सा लगता है, फिर जुड़ जाता है।
सबसे अधिक मन को छूता है वह ठौर जहाँ रेखा टूटने-सी लगती है। जहाँ वह लगभग मिट जाने भर पतली हुई। वहाँ हम साँस रोक लेते हैं।
टूट जाएगी?
पर रेखा टूटती नहीं। पतली होकर भी जुड़ी रहती है। और फिर जी उठती है।
यही सहने का रूप है। सहना सदा बलवान नहीं होता। सहने में टूटने-सा एक क्षण होता है। जब लगे कि और नहीं झेला जाएगा। पर न टूटकर, पतले ही सही, चलते रहना। यही सहना है।
केवल मोटी रेखा में आगे बढ़ना ही जीवन नहीं। टूटने-सा जुड़ा रहना भी जीवन है। शायद वही अधिक गहरा जीवन है।
किसी की रेखा भी इस समय कहीं पतली हो रही होगी। टूट नहीं रही। बस पतली हो रही है।
एक ही रेखा के भीतर, एक पूरा जीवन समाया है।





